Tuesday, 28 May 2019

प्रेम पत्र

प्रेम की उत्पत्ति कब हुई इसकी पूर्ण जानकारी उपलब्ध नहीं है, परंतु आज यह अपने कई दौर से होता हुआ बिल्कुल अलग ढंग से व्यक्त किया जा रहा है।

 आपको मालूम हो कि तरीका चाहे जैसा रहा हो पर किसी विशेष रिश्ते के लिए इसकी तासीर हमेशा एक जैसी रही है ।
कई सार्वभौमिक प्राकृतिक उत्पत्तिओं में से यह भी एक सार्वभौमिक तत्व है जो ढाई अक्षर की अपूर्णता लिए हुए पूर्णता को व्यक्त करता है। अगर गणितीय रूप में इसे व्यक्त किया जाए तो इसे परिमेय संख्या के अंतर्गत रखना अधिक उचित होगा। प्रेम को व्यक्त करने के लिए किसी विशेष पैमाने की जरूरत नहीं होती यह जब जिसके लिए होता है स्वयं उसके लिए व्यक्त हो जाता है। प्रेम के कई रूप हैं उन्हीं रूपों में से हम नायक नायिका के प्रेम की चर्चा करेंगे आज के वर्तमान युग में संचार क्रांति से शायद ही कोई अछूता हो और इस क्रांति के कारण प्रेम को व्यक्त करने के तरीके भी बदले हैं, परंतु मोबाइल जब नहीं था तब लोग अपनी प्रेमा अभिव्यक्ति प्रेम पत्र से किया करते थे।


 बात 21 वी शताब्दी के शुरुआती दिनो की है।

नायक नायिका का प्रेम परवान चढता है ,नायक शादी सुदा है  दोनों लोक लाज के चलते एक दूसरे  से मिल नहीं पाते, कभी सामने आने पर नैनों से ही आपसी अभिव्यक्ति होती है और वे एक दूसरे से एकांतमय,  क्षण मात्र के लिए ही हो पाते हैं , यह सब चल ही रहा था कि इसी बीच नायिका के विवाह के लिए घर वाले कही  रिश्ता देख आते हैं और शादी की तैयारी शुरू हो जाती है।
 जिससे वह अपने प्रेमी के लिए और तड़प जाती है तब वह नायक को एक प्रेम पत्र लिखती है जिसमें अभिव्यक्ति कम और सवाल अधिक होते हैं, और उन्हीं सवालों के मद्देनजर नायक एक प्रेम पत्र नायिका के लिए लिखता है उसके सवालों के जवाब के साथ:-
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आप कहती हैं कि हमारा आपका रिश्ता क्या है?
 तो सुनो प्रिये, हमारा आपका रिश्ता राधा- किशन के जैसा है, जिसे शादी जैसी परंपरा में नहीं बांधा जा सकता, जो सात जन्मो तक का ही नहीं वरन जन्म जन्मांतर का है जो सात्विक  प्रेम तथा आत्मिक और आध्यात्मिक सोच का स्वामी है, कुछ ऐसी चीजें हैं जिनको बनाया नहीं जा सकता वह तो परमेश्वर की मूल कृतियों के रूप में इस सर जमीन पर आते हैं और सदैव के लिए ईश्वर सत्ता का मूल आधार बन जाते हैं।
 प्रिये हम कैसे समझाएं कि हमारा आपका रिश्ता क्या है?
अब आप ही बताइए कि क्या ईश्वरी पवित्रता को समझाया जा सकता है इसे तो सिर्फ महसूस किया जा सकता है।



 हमारे आपके बीच का रिश्ता चांद- सूरज का है, नदी- पहाड़ का है, रात- दिन का है, जल -वायु का है ऐसे ना जाने कितने अनगिनत रिश्ते हैं जिनको पूर्ण रूप से विदित करना मेरे सामर्थ से बाहर है!! पर आप ही बताइए कि क्या चांद- सूरज, नदी- पहाड़, रात- दिन, जल -वायु आदि के रिश्तो को सात फेरों के बंधन में बांधा जा सकता है?
 शायद आप भी कहेंगी नहीं?
 ठीक इसी प्रकार प्रिये हमारे रिश्ते की डोर है, जिनको सामाजिक मान्यता की जरूरत नहीं यह तो दैवी अनुकंपा की प्रतिमूर्ति है जो सदियों से चला आ रहा है और अनादि तक बना रहेगा।
 अब सवाल यह आता है कि आप तो किसी और के हैं ?
पर मैं कहता हूं कि:-- नहीं, नदिया तो पहाड़ की हैं, रात तो दिन का है, जल तो वायु का है, और चांद, सूरज का ही है, लोगों ने इनको अपना मान लिया तो क्या होता है? क्या लोगों के कहने से इनके रिश्ते टूट जाएंगे नहीं प्रिये नहीं इनके आदि-अतं की कल्पना भी ना करना, यह तो चिरकाल के स्वामी हैं।
 अब रही बात मेरे याद आने की तो सुनो प्रिये, वह इसलिए आती है जिससे हमारा अस्तित्व बना रहे और प्रेम शब्द को आश्रय प्राप्त हो सके। तथा वह जीवित रह सके। नदियां पहाड़ को याद करके ही तो प्रवाह मान हैं सगिंता,जल,वायु की उत्पत्ति है रात, दिन का प्रेरक है अब तुम ही बताओ जब अपना प्यार ही इनके जैसा है तो भला कैसे ना याद आऊं आप का याद करना और मेरा याद आना कहीं से अप्रासंगिक नहीं है प्रिये यह तो प्राकृतिक सत्ता का पोषक है।
 अतः इसे आत्मसात करके जीवन की डोर मजबूत करो यही मेरा अनुनय है और यही आपका विनय है।
 आप कहती हैं कि बार-बार आपको याद करके आंखें भर आती हैं तो सुनो प्रिये यह तो आपका बड़प्पन है कि आप प्रेम की सूखती सरजमी को अपने अश्रुओं से सिंचित करती रहती हैं । जो अपने प्रेम को बल देता है।
 रही बात पल भर के लिए याद ना जाने की तो सुनो तपस्विनी यह तो आपका अगाध और अद्बिति अनुराग है जो पल भर के लिए भी आप हमें भुलाती नहीं।
 फूलों को तो महक शैने-शैने  छोड़ जाती है परंतु आप तो वह खुशबू हैं जो इस फूल को अब भी महँका रही हैं, आप तो मेरे मन मंदिर की अद्वितीय प्रतिमूर्ति हैं जो मेरी योग्यता को विस्तार दिया है इसके आगे और क्या कहूं और क्या लिखूं सारा अंश तो तेरे प्यार का है।।।

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