Saturday, 25 May 2019

बचपन

वैसे तो बचपन हर जीव का होता है परंतु इसे याद सिर्फ इंसान ही रख पाता है।
 यह वह उम्र होती है, जो खुशियों का खजाना लिए हुए होता है ,तभी तो जिस मिट्टी (लगने) से हम घबराते हैं उसमें भी यह खुशियां ढूंढ लेता है ,जानते हैं क्यों? क्योंकि यह वह उम्र होती है जिसमें अच्छे और बुरे का  स्थाई भान अपनो व  मित्रों के लिए नहीं होता और हो भी जाए तो बस थोड़े समय के लिए होता है, तभी तो हम खेल -खेल में नाराज होकर भी कुछ समय बाद उसी से  जाकर मिल जाते थे जिसके लिए घर के बड़ो को तू तू मैं मैं करनी पड़ी थी।
 आखिर बचपन इतना खुशियों भरा क्यों है??
 शायद इसलिए की जब हमारे गुब्बारे फूट जाते थे तब भी हम उसे उतना ही चाहते थे जितना कि उसमें हवा भरी रहने पर, बस फर्क यह था कि उससे खेलने की विधि बदल देते थे।  अतः हम कह सकते हैं कि टूटने व जुड़ने की बीच की कड़ी ही बचपन है, टूटे हुए खिलौने से खेलना ही बचपन है, हानि लाभ का हिसाब न रखना बचपन है,  हर चीज में खुशियां ढूंढ लेना बचपन है ,पूजा की पंजीरी से पेट भर लेना बचपन है, और तो और जिस उम्र में थकना मना है, वह बचपन है।
आपको तो याद होगा चोर सिपाही का वह खेल जिसमें कुछ लोग सिपाही व कुछ लोग चोर का किरदार निभाया करते थे, जिसमें सिपाही का किरदार करने वाला बालक चोर किरदार वाले बालक के प्रति कड़ाई से पेश आता था और उसके प्रति दंडात्मक कार्यवाही करता था। परंतु सवाल यह उठता है कि जो बालक बचपन में इतना न्याय प्रिय था बड़े होने पर उसमे इतना बदलाव क्यों दिखता है? यह प्रश्न हम आपके लिए छोड़ रहे हैं आप स्वयं मंथन करें।

 गर्मियों में आम की बगिया में जाना तो याद होगा जहां मित्रों के साथ खूब मस्तियां किया करते थे और गर्म हवाएं (लू )हमें छू कर आगे निकल जाया करती थी और हम थे की टस से मस नहीं होते थे, और यह पुनरावृति दिन में कई बार होती थी। और हमारी इस हठधर्मिता के कारण वह गर्म हवाएं कभी-कभी आधियों का रूप धारण कर लिया करती थी और हम उसका भी स्वागत अपनी मनो पूर्ति (आंधी आएगी तो आम गिरेंगे) के लिए करते थे और हमारी खुशी देख कर  उसे रोना आ जाता, और हम थे की उसे बरसात समझ बैठते।

 और उन्हीं बारिश के दिनों में कागज की नाव चलाना तो याद होगा, वही जिससे हम शांत जल में तैरने की अपेक्षा करते थे और हमारी अपेक्षा पर यदि खरा न उतरे तो हम उस शांत जल में लहरें पैदा करते थे, और कभी कभी लहरों का पैटर्न बिगड़ जाने पर नाव डूब जाती थी और फिर निराशा और मस्ती में आकर हम औरों की नाव चलाने और डुबाने पर लग जाते थे। और यह प्रक्रिया तब तक चलती थी जब तक की घर लौटने का समय ना हो जाए या किसी कोने से बुलावा ना आ जाए।  बचपन जिद पर आधारित होता है तभी तो हम जिस चीज के लिए जिद कर लेते थे उसे पूरा होने तक दबाव बनाए रखना अपना कर्तव्य समझते थे।अब आप कहेंगे की जिद तो बड़ों में भी पाई जाती है तो हम कहेंगे कि दोनों में मूल अंतर यह है कि बचपन का ज़िद अधिकतर अपेक्षा त्मक होता है,जबकि बड़ों का जिद अधिकतर क्रियात्मक होता है.................

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