Thursday, 13 June 2019

भूल(द्वितीय अकं)

प्रथम अकं से अगे ----



प्रसाद घर आता है और देव को फोन लगाता है,दोनों की आपसी बातचीत होती है और उससे उस मोबाइल नंबर की जानकारी मांगता है जिस पर उसने बहुत सारे एसएमएस कर दिए थे।

देव उस नंबर के बारे में अंशतः जानकारी देते हुए कहता है-वह नंबर मेरे घर का है।इस पर प्रसाद बड़ी ही शर्मिंदगी और क्षमा भाव से अपनी उस गलती के लिए माफी मांगता है।

 प्रसाद को बेहद दुख इस बात के लिए होता है कि शायद वह लड़की देव की बहन थी, जिसको उसने इतना परेशान किया और बात-बात में वह देव से कह बैठता है कि वह तुम्हारी सिस्टर है क्या?

पर देव इस प्रश्न का उत्तर संतोषजनक नहीं दे पाता है और मुस्करा कर रह जाता है,और कहता है उसी से पूछ लो,देव की इस बात से प्रसाद को बहुत आश्चर्य होता है और सोचता है कि,यह कैसा अनुचित मजाक कर रहा है।

क्योंकि प्रसाद अब तक की बात से यही समझ रहा था कि सिन्नी (Sinni)उसकी बहन है, और मित्र के परिवार के साथ अपने द्वारा किए गए अनुचित व्यवहार को वह स्वयं नहीं सह पा रहा था, और शर्म के मारे गडा जा रहा था।

 इसका कारण यह था कि प्रसाद बहुत ही साफ दिल का इंसान था और मित्र व मित्र मंडली को अपनी तरफ से दागदार नहीं करना चाहता था,

पर प्रसाद के मन में यह चल रहा था कि ऐसी गलती हुई कैसे?

 वह सोच रहा था कि शायद सिन्नी(Sinni),देव का मोबाइल लेकर उसमें से मेरा नंबर निकाला और डायल किया, पर किस लिए बातें करने के लिए आखिर कैसी बातें करने के लिए?
 प्रसाद अभी इसी पशोपेश में था कि देव बोल उठा क्या सोच रहे हो ?

प्रसाद ने कहा आखिर यह सब हुआ कैसे?

देव फिर कहता है उसी से पूछ लो-- फिर यही कहते हुए देव ने सिन्नी को मोबाइल दे दिया,और फिर सिन्नी मुस्कुराते हुए बोली हेलो... प्रसाद उसकी मुस्कान और बोली की मिठास में ही गुम हो गया फिर खुद को संभालते हुए बोला आप कौन?

 सिन्नी बोली, वही जिसको आप प्यार भरे sms कर रहे थे।

प्रसाद शरमा गया और फिर बोला मेरे कहने का मतलब आपका और देव का क्या रिश्ता है?
 

फिर सिन्नी मुस्कुरा कर बोली, देव से ही पूछ लो।

अब प्रसाद भी हंसने लगा था और कहा आखिर तुम लोग अपने रिश्ते के बारे में बता क्यों नहीं रहे हो?

इस पर दोनों की एक साथ आवाज आयी,खुद समझो?


प्रसाद अब समझ गया था कि ए दोनों हीर-रांझे की भूमिका में है।


इस लिये अब उनके साथ प्रसाद भी बातों का लुफ्त उठाने लगा था और मजाक में कहा देव भाई है, तो क्या आप को भाभी कहूं?


इस पर सिन्नी भी मुस्कुरा कर कहीं अभी नहीं।
प्रसाद आखिर फिर कब?
 


सिन्नी-- जब वह समय आएगा तो आपको पता चल जाएगा।


देव मुस्कुराते हुए--- दूसरे की लवर पर ही डोरे डालोगें कि अपनी भी खोजोगें?

 

प्रसाद मुस्कुराते हुए--- हम तो अपनों की ही अपनी मान चुके हैं।


देव--बातें ना बनाओ कुछ अच्छा सोचो।

 

प्रसाद--जो अच्छा सोचते वह तुमने सोच लिया तो अब बचा ही क्या?


देव--अच्छे की कोई सीमा है क्या जो खत्म हो जाएगी?

 

प्रसाद---सीमा तो नहीं है पर सीमित है।


 देव---आखिर जिसकी सीमा नहीं है वह सीमित कैसे हो सकती है?

 

प्रसाद--यदि आपको कोई चीज वस्तु या व्यक्ति पसंद आ जाए और वह ना मिले तो समझो सीमित ही है।

 सिन्नी मुस्कुराते हुए--आखिर वह सीमित चीज वस्तु या व्यक्ति कौन है जो आपको मिली नहीं?
 

ऐसी ही मस्तियां चल ही रही थी कि प्रसाद फिर से पूछ बैठा कि आखिर तुमको हमारा मोबाइल नंबर मिला कैसे?


 (फिर से वो एसएमएस की पूरी कहानी पापा का मोबाइल नंबर देव की सिम आदि के बारे में बताती है जिसका प्रथम अंक में विस्तृत वर्णन है)आप वहां जाकर पढ़ सकते हैं।

 अब देव,प्रसाद,सिन्नी तीनों एक दूसरे से परिचित हो गए थे,

अतः आए दिन प्रसाद की बात सिन्नी से भी हो जाया करती थी।

आप को बता देना चाहता हूँ कि, प्रसाद रसिक स्वभाव का होते हुए भी अपने दिल की सर जमी को प्यार की बूंदों से अभिसिंचित नहीं कर सका था,

जब कि सिन्नी प्यार की घटाओं तले अठखेलियां कर रही थी,

 

उसकी इस अठखेलियों से लालायित होकर उसके इर्द-गिर्द लड़कों का जाल बिछा रहता था, और सभी  उसे प्रसाद की तरह ही पाना चाहते थे पर पाना जरूर चाहते थे।
 

इधर सिन्नी थी की देव के चरणों की धूल बनकर उड़ने को तैयार थी,उड़ने को तैयार थी या यूं कहा जाए कि उसके चरणों में चिपकना भी शुरू कर दिया था तो अतिशियोति नहीं होगी ।

समय अपनी चाल से चल ही रहा था कि 1 दिन सिन्नी ने खुद ही अपने मोबाइल से प्रसाद को फोन करती है,दोनों की आपसी बातचीत होती है परंतु इस वार्तालाप के दौरान प्रसाद ने कई बार देव का जिक्र किया,और सिन्नी से पूछता है कि, देव कहां है?

इस पर सिन्नी तपाक से बोल उठती है कि,
क्या देव के रहने पर ही आप से बातें कर सकती हूं?

प्रसाद-- नहीं ऐसा नहीं कि उसके रहने पर ही आप बात करो, बस यूं ही पूछ रहा था।

सिन्नी-- आपके यूं ही का क्या मतलब?

प्रसाद-- मेरे यूं ही का मतलब कहां गया है इस समय क्या कर रहा है तुम दोनों में सब ठीक तो है।

सिन्नी--बड़ा ख्याल रखते हो उसका?

प्रसाद मुस्कुराते हुए-- ऐसा नहीं है।
ख्याल तो मैं आपका भी रखता हूं आपने कभी महसूस ही नहीं किया।

सिन्नी--मुस्कुराते हुए बड़े आए ख्याल रखने वाले एक भी एसएमएस और फोन कॉल तो करते नहीं ख्याल रखते हैं?

प्रसाद-- क्यों फोन नहीं करता अभी परसों ही तो तुमसे बात हुई थी।

 

सिन्नी-- वह तो देव के मोबाइल पर आपने फोन किया था कभी मेरे मोबाइल पर फोन किया?

 

प्रसाद--  जब देव खुद ही बात करा देता है तो ऐसा करने कि मैं जरूरत नहीं समझता।

सिन्नी-- पर मुझे जरूरत है।

सिन्नी की यह बात सुनकर प्रसाद की हंसी पर ताले लग गए, जो कि अभी तक दोनों हंस-हंसकर ही बातें कर रहे थे।

इस पर सिन्नी कहती है, क्या हुआ कुछ गलत कह दिया क्या?

 प्रसाद--  नहीं सरकार,आपकी बातों में इच्छा और आदेश है, जो मित्र धर्म के प्रतिकूल है।

सिन्नी-- आपने हमको सरकार कहा इसलिए मैं आपको अब आदेश देती हूं कि मेरी इच्छा और आदेश दोनों का पालन करें।


 अब प्रसाद देव को एसएमएस और फोन तो करता था पर कभी- कभी सिन्नी को भीsms कर देता था, वो इस लिए कि सिन्नी भी प्रसाद को sms कर देती थी,  पर प्रसाद अब भी सिन्नी से, देव के मोबाइल पर ही बात करता था।

 समय अपनी गति से चल ही रहा था कि, देव 1 दिन सिन्नी के मोबाइल को देख  कर चिढ़ गया और उससे प्रसाद के द्वारा भेजे गए sms के बारे में जानना चाहा।

परंतु इस बात का सिन्नी, देव को शायद संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकी जिसके कारण वह सवालों के घेरे में आ गई।
 इस बात को सिन्नी, प्रसाद को नहीं बताती है और वह पहले की तरह ही प्रसाद से  जुड़ी रही।

जिसका परिणाम यह होता है कि देव,सिन्नी का आपसी रिश्ता तू -तू मैं-मैं पर जा पहुंचता है।

 इधर प्रसाद को इस बात की भनक तक भी नहीं लगती और जब वह इस बात को जानता है तब तक दरिया में पानी काफी बह चुका था।

होता यह है कि देव, सिन्नी से इस बात को लेकर झगड़ा करता है और उसी के सामने अपने मित्र, प्रसाद को भी काफी बुरा भला कहता है जिस पर सिन्नी भड़क जाती है, और प्रसाद का बचाव करते हुए कहती है कि उसकी कोई गलती नहीं है मैं ही उसे sms करती हूं तो वह भी हमें भेज देता है, और  सिन्नी माफी मांगती है कि आगे से ऐसा नहीं होगा।

 परंतु प्रेम में पड़े व्यक्ति को इस बात का विश्वास करना मुश्किल है कि उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं रहा, इसीलिए रंगे हाथ देव ने प्रसाद को भी फोन कर दिया और मित्र धर्म के विपरीत पूरी शत्रुता के लहजे में उससे पूछा कि तुम सिन्नी को smsक्यों करते हो?

इस पर प्रसाद मुस्कुराते हुए कहा---  बहु धनुही तोरी लरिकाईं, कबहु ना अस रिषि किंही गोसाई।

 

क्या बात है, क्यों इतने नाराज हो?
 

अजी कभी-कभी सिन्नी हमें smsकर देती थी तो हम भी जवाब में भेज देते थे, हमारा  मनतब्य तुम्हारा प्यार हथियाना नहीं था।

अगर इस बात के लिए तुम्हें तकलीफ है तो हम क्षमा प्रार्थी हैं आगे से ऐसा नहीं होगा और यह कह कर प्रसाद भी फोन काट देता है।

(शायद उसके पास कोई और आ गया था और वह उसे इस रंगमंच पर चल रहे शाब्दिक चित्रण से आनंदित नहीं होने देना चाह रहा था।)

समय बीतता जाता है, सिन्नी और देव के बीच में क्या चल रहा है इस बात से प्रसाद का कोई सरोकार नहीं रहा,क्योंकि बड़े दिन बीत गए हैं देव व प्रसाद की आपसी बात चीत नहीं हुई, और प्रसाद भी खुद को परिस्थितियों के चलते संकुचित कर लेता है ।

जैसा कि आपको बता चुका हूं कि, सिन्नी का परिवार काफी खुले विचारों वाला था, अतः सिन्नी भी बहुत ही ओपन माइंड थी जिसके चलते उसके अपने इर्द-गिर्द के कुछ व्यक्तियों से मित्रवत व्यवहार हो ही जाता था।

परंतु देव को यह सब अच्छा नहीं लगता था और  आए दिन उन दोनों के बीच कहासुनी हो ही जाती थी जिसका परिणाम यह निकला कि दोनों का संबंध विच्छेद हो ही जाता है और कभी न मिलने, कभी ना बात करने की सीमा रेखा तक पहुंच जाता है।



अब खुशहाल सिन्नी बहुत ही बुझी-बुझी सी रहने लगी थी।
 

उसके इर्द-गिर्द बहुत से उसे चाहने वाले थे पर उसका मन अशांत ही रहता था।

फिर 1 दिन सिन्नी, प्रसाद को sms करके सारी बातें बताती है, तब प्रसाद सिन्नी को फोन करता है और कहता है कि तुम कहो तो मैं देव से बात करूं परंतु सिन्नी मना कर देती है,कि अब कोई फायदा नहीं वह तुम्हें भी कुछ भला बुरा कह देगा, और मैं भी उससे कोई संबंध नहीं रखना चाहती दोनों में इतनी बातें होती हैं और फिर फोन कट जाता है।

इधर देव, प्रसाद की भी आपसी बातचीत बंद हो गई थी रही बात sms कि तो प्रसाद तो कभी-कभी कर भी देता था पर, देव शायद रुचि नहीं लेता था इसीलिए वह उसका कभी जवाब नहीं दिया इसीलिए प्रसाद भी अब उससे दूर दूर ही रहने लगा था।
 

इधर सिन्नी और देव के आपसी रिश्ते में खटास आ जाने के कारण, अब सिन्नी कभी-कभी प्रसाद को फोन कर देती थी और प्रसाद भी उससे बातें कर लेता था, पर प्रसाद बातचीत के दौरान देव का जिक्र जरूर करता था।

 इधर सिन्नी, देव से ना जाने क्यों इतनी चिढी हुई थी कि उसका नाम आते ही वह आग बबूला हो जाती थी।

 

इसीलिए शायद उसने प्रसाद को दो टूक जवाब दे दिया कि अब अगर हमसे देव के बारे में कुछ पूछा तो मैं आपसे बात नहीं करूंगी प्रसाद उसकी इस बेरुखी का कोई जवाब नहीं देता है और शांत बना रहता है।

 

इस पर सिन्नी बोलती है, क्या हुआ?
 प्रसाद कहता है- कुछ नहीं।
 

सिन्नी-- फिर इतने गुमसुम क्यों हो गए?
 

प्रसाद -- कोई बात नहीं है बस तुमको ही तो सुन रहा था।

 

सिन्नी-- हमसे दोस्ती करोगे?
 

प्रसाद--- दोस्ती तो है, वह करने की क्या जरूरत।
 

सिन्नी--  वह कैसे?

 प्रसाद--  अगर दोस्ती ना होती तो तुम हमसे इतनी सारी बातें क्यों करती?
 

सिन्नी इस बात पर हँस देती है।
  

देव के जाने के बाद आज पहली बार उसको किसी ने हंँसाया था,  शायद इसीलिए वह उसकी  तरफ खींची सी जा रही थी।






शेष अगले अकं मे...........

Sunday, 2 June 2019

BHOOL (pratham ank)


 kya aapane kabhee socha tha ki aap kee ek galatee aapakee aur unakee lav storee ban jaegee? kya aapane kabhee socha tha ki, aapane abhee -abhee jo kaam kiya hai yah jaroorat ke vipareet gul khilaayega? kya aapane kabhee socha hai ki, jab khilane kee prakriya shuroo ho hee jaatee hai, to yah dil ke anuroop ho jaatee hai?
 haan aisa ho sakata hai!
 basharte shart yah hai kee, prakriya do dilon ke judaav kee ho kuchh aisee hee ghatana prasaad va sinnee ke jeevan mein ghatatee hai.

 e kahaanee tab kee hai jab mobail mein 2g seva apane charam par thee . seedhe taur par kaha jae to kahaanee kee shuruaat 3 paatron dev, prasaad,sinnee se hotee hai, parantu kahaanee ke antargat any paatron kee bhee bhoomika  rahatee hai jo kahaanee ko bal dete hain.


 



 dev aur prasaad donon alag - alag shahar se the parantu ek hee kolej mein padhane ke kaaran donon kee mitrata ho jaatee hai aur donon kolej kee padhaee khatm karane ke baad apane-apane ghar chale jaate hain parantu mobail se baaten aur sms, shero-shaayaree va any baaten hotee rahatee thee jaisa ki do mitron ke beech hota hai.

 jabaki dev aur sinnee ek hee shahar va jaati se bilong karate the.

 


 sinnee ka bhaee va dev ek saath hee snaatak tak kee padhaee kee thee jisake kaaran dev ka sinnee ke ghar aana-jaana laga rahata tha. jisake chalate dev va sinnee kee aapasee najadeekiyaan badhee, sinnee ka parivaar kaaphee khule vichaaron vaala tha iseelie dev va sinnee kee badhatee najadeekiyon par shaayad log dhyaan nahin dete the, idhar jab sinnee va dev ka pyaar peegeen bhar raha tha, usee samay prasaad kee intree bade hee naatakeey dhang se hotee hai.

 hota yah hai ki prasaad apane mitr dev ko ek pyaar bhara sms bhejata hai parantu usakee sim, sinnee kinhee kaaranon se apane paapa ke mobail mein lagaee huee thee, jisake kaaran vah sms usake paapa ke mobail mein pahunch jaata hai.

 

 sinnee, dev ka sim nikaal kar usake mobail mein to laga detee hai parantu yah smsusake paapa ke mobail mein hee rah jaata hai.

 sinnee ke paapa ek shikshak the jo us samay ritaayard ho chuke the. kuchh dinon ke baad sinnee  jab apane paapa ka mobail dekh rahee thee usee samay usakee nigaah us sms par pad jaatee hai jo bada hee eksaiting aur pyaar bhara tha. aise sms ko dekh kar usako yah laga ki bhala paapa ko  aisa sms kaun kiya hai. aur kaaphee pashopesh ke baad vah bina paapa ko bataen us nambar par phon karatee hai yah jaanane ke lie ki aakhir yah kaun hai.

 sinnee jaise hee vah mobail nambar daayal karatee hai, to doosaree taraph se ek shakhs kee aavaaj aatee hai- helo, sinnee aavaak rah jaatee hai,vah isalie ki usane to socha tha ki kisee mahila kee aavaaj aaegee parantu yah to ek purush kee aavaaj thee . idhar prasaad ne doosaree taraph se ek mahila kee aavaaj sunee to vah bhee kaha haan kahie kisase baat karanee hai, phir sinnee bolatee hai ki, is nambar (prasaadake) se hamaare mobail nambar par smsaaya tha par prasaad kahata hai ki mainne to koee esemes nahin bheja tha, par sinnee ad jaatee hai,to thodee too-too mai-mai hotee hai,aur phir donon ek doosare ka aanshik parichay lekar phon kaat dete hain.

 ab prasaad apane mobail se send kie esemes ko dekhata hai kya vaastav mein mainne is nambar par sms bheja tha, kaheen bhool se to aisa nahin ho gaya kaaphee khoj niyoj ke baad prasaad yah sunishchit kar leta hai ki mainne is nambar par koee sms nahin bheja .

 idhar prasaad ko usakee meethee garjana  dil mein chubhee  ja rahee thee aur man mein sharaarat uthane lagee jisake kaaran usane ek  nahin kaee sms usee nambar par send kar diya,jo apane aap me pooree mohabbat kee paathashaala thee. choonki sinnee ne prasaad ke mobail nambar ko apane mobail nambar se daayal kiya tha atah saare smssinnee ke mobail ke inaboks mein ja gire.

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 idhar sinnee jhooth bol kar bura phans gaee thee, usako laga ki yah ladaka to peechhe hee pad gaya aur isee baat ke chalate usane dev se yah baat bataee, usane kaha ki is mobail nambar( prasaad ke) se bahut saare esemes aa rahe hain aur yah ladaka bevajah hamako pareshaan kar raha hai, is par dev ek sachche aashik kee bhoomika nibhaate hue us nambar par kol karata hai to doosaree taraph se prasaad kee aavaaj aatee hai. par prasaad ke bheed-bhaad vaalee jagah hone ke kaaran donon se thodee baat hotee hai aur dev apana virodh darshaata hai, choonki dev ne sinnee ka hee mobail yooj kiya tha atah prasaad ke nambar ko pahachaan nahin paaya, kyonki usako nambar yaad nahin tha par prasaad ne dev kee aavaaj pahachaan liya tha........

 shesh agale ank me.....

भूल (प्रथम अंक)

क्या आपने कभी सोचा था कि आप की एक गलती आपकी और उनकी लव स्टोरी बन जाएगी? क्या आपने कभी सोचा था कि, आपने अभी -अभी जो काम किया है यह जरूरत के विपरीत गुल खिलायेगा? क्या आपने कभी सोचा है कि, जब खिलने की प्रक्रिया शुरू हो ही जाती है, तो यह दिल के अनुरूप हो जाती है?
 हां ऐसा हो सकता है!
 बशर्ते शर्त यह है की, प्रक्रिया दो दिलों के जुड़ाव की हो कुछ ऐसी ही घटना प्रसाद व सिन्नी के जीवन में घटती है।

 ए कहानी तब की है जब मोबाइल में 2G सेवा अपने चरम पर थी । सीधे तौर पर कहा जाए तो कहानी की शुरुआत 3 पात्रों देव, प्रसाद,सिन्नी से होती है, परंतु कहानी के अंतर्गत अन्य पात्रों की भी भूमिका  रहती है जो कहानी को बल देते हैं।



 देव और प्रसाद दोनों अलग - अलग शहर से थे परंतु एक ही कॉलेज में पढ़ने के कारण दोनों की मित्रता हो जाती है और दोनों कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद अपने-अपने घर चले जाते हैं परंतु मोबाइल से बातें और SMS, शेरो-शायरी व अन्य बातें होती रहती थी जैसा कि दो मित्रों के बीच होता है।

 जबकि देव और सिन्नी एक ही शहर व जाति से बिलॉन्ग करते थे।

   सिन्नी का भाई व देव एक साथ ही स्नातक तक की पढ़ाई की थी जिसके कारण देव का सिन्नी के घर आना-जाना लगा रहता था। जिसके चलते देव व सिन्नी की आपसी नजदीकियां बढ़ी, सिन्नी का परिवार काफी खुले विचारों वाला था इसीलिए देव व सिन्नी की बढ़ती नजदीकियों पर शायद लोग ध्यान नहीं देते थे, इधर जब सिन्नी व देव का प्यार पीगेें भर रहा था, उसी समय प्रसाद की इंट्री बड़े ही नाटकीय ढंग से होती है।

 होता यह है कि प्रसाद अपने मित्र देव को एक प्यार भरा sms भेजता है परंतु उसकी सिम, सिन्नी किन्ही कारणों से अपने पापा के मोबाइल में लगाई हुई थी, जिसके कारण वह sms उसके पापा के मोबाइल में पहुंच जाता है।

सिन्नी, देव का सिम निकाल कर उसके मोबाइल में तो लगा देती है परंतु यह smsउसके पापा के मोबाइल में ही रह जाता है।

सिन्नी के पापा एक शिक्षक थे जो उस समय रिटायर्ड हो चुके थे। कुछ दिनों के बाद सिन्नी  जब अपने पापा का मोबाइल देख रही थी उसी समय उसकी निगाह उस SMS पर पड़ जाती है जो बड़ा ही एक्साइटिंग और प्यार भरा था। ऐसे sms को देख कर उसको यह लगा कि भला पापा को  ऐसा sms कौन किया है। और काफी पशोपेश के बाद वह बिना पापा को बताएं उस नंबर पर फोन करती है यह जानने के लिए कि आखिर यह कौन है।

सिन्नी जैसे ही वह मोबाइल नंबर डायल करती है, तो दूसरी तरफ से एक शख्स की आवाज आती है- हेलो, सिन्नी आवाक रह जाती है,वह इसलिए कि उसने तो सोचा था कि किसी महिला की आवाज आएगी परंतु यह तो एक पुरुष की आवाज थी। इधर प्रसाद ने दूसरी तरफ से एक महिला की आवाज सुनी तो वह भी कहा हां कहिए किससे बात करनी है, फिर सिन्नी बोलती है कि, इस नंबर (प्रसादके) से हमारे मोबाइल नंबर पर smsआया था पर प्रसाद कहता है कि मैंने तो कोई एसएमएस नहीं भेजा था, पर सिन्नी अड जाती है,तो थोड़ी तू-तू मै-मै होती है,और फिर दोनों एक दूसरे का आंशिक परिचय लेकर फोन काट देते हैं। 

अब प्रसाद अपने मोबाइल से सेंड किए एसएमएस को देखता है क्या वास्तव में मैंने इस नंबर पर sms भेजा था, कहीं भूल से तो ऐसा नहीं हो गया काफी खोज नियोज के बाद प्रसाद यह सुनिश्चित कर लेता है कि मैंने इस नंबर पर कोई sms नहीं भेजा।

इधर प्रसाद को उसकी मीठी गर्जना  दिल में चुभी  जा रही थी और मन में शरारत उठने लगी जिसके कारण उसने एक  नहीं कई SMS उसी नंबर पर सेंड कर दिया,जो अपने आप मे पूरी मोहब्बत की पाठशाला थी। चूंकि सिन्नी ने प्रसाद के मोबाइल नंबर को अपने मोबाइल नंबर से डायल किया था अतः सारे smsसिन्नी के मोबाइल के इनबॉक्स में जा गिरे।

 प्रसाद ने ऐसा इसलिए भी किया था कि, जिस बात के लिए सिन्नी ने उस पर ब्लेम लगाया था वह बात तो होनी ही चाहिए थी। अर्थात सिन्नी ने झूठ बोला था कि उसके फोन नंबर पर उसने smsकिया था। अतः प्रसाद sms. करके वह बात पूरी कर रहा था।

 इधर सिन्नी झूठ बोल कर बुरा फंस गई थी, उसको लगा कि यह लड़का तो पीछे ही पड़ गया और इसी बात के चलते उसने देव से यह बात बताई, उसने कहा कि इस मोबाइल नंबर( प्रसाद के) से बहुत सारे एसएमएस आ रहे हैं और यह लड़का बेवजह हमको परेशान कर रहा है, इस पर देव एक सच्चे आशिक की भूमिका निभाते हुए उस नंबर पर कॉल करता है तो दूसरी तरफ से प्रसाद की आवाज आती है। पर प्रसाद के भीड़-भाड़ वाली जगह होने के कारण दोनों से थोड़ी बात होती है और देव अपना विरोध दर्शाता है, चूँकि देव ने सिन्नी का ही मोबाइल यूज किया था अतः प्रसाद के नंबर को पहचान नहीं पाया, क्योंकि उसको नंबर याद नहीं था पर प्रसाद ने देव की आवाज पहचान लिया था........

शेष अगले अंक मे.....

Tuesday, 28 May 2019

प्रेम पत्र

प्रेम की उत्पत्ति कब हुई इसकी पूर्ण जानकारी उपलब्ध नहीं है, परंतु आज यह अपने कई दौर से होता हुआ बिल्कुल अलग ढंग से व्यक्त किया जा रहा है।

 आपको मालूम हो कि तरीका चाहे जैसा रहा हो पर किसी विशेष रिश्ते के लिए इसकी तासीर हमेशा एक जैसी रही है ।
कई सार्वभौमिक प्राकृतिक उत्पत्तिओं में से यह भी एक सार्वभौमिक तत्व है जो ढाई अक्षर की अपूर्णता लिए हुए पूर्णता को व्यक्त करता है। अगर गणितीय रूप में इसे व्यक्त किया जाए तो इसे परिमेय संख्या के अंतर्गत रखना अधिक उचित होगा। प्रेम को व्यक्त करने के लिए किसी विशेष पैमाने की जरूरत नहीं होती यह जब जिसके लिए होता है स्वयं उसके लिए व्यक्त हो जाता है। प्रेम के कई रूप हैं उन्हीं रूपों में से हम नायक नायिका के प्रेम की चर्चा करेंगे आज के वर्तमान युग में संचार क्रांति से शायद ही कोई अछूता हो और इस क्रांति के कारण प्रेम को व्यक्त करने के तरीके भी बदले हैं, परंतु मोबाइल जब नहीं था तब लोग अपनी प्रेमा अभिव्यक्ति प्रेम पत्र से किया करते थे।


 बात 21 वी शताब्दी के शुरुआती दिनो की है।

नायक नायिका का प्रेम परवान चढता है ,नायक शादी सुदा है  दोनों लोक लाज के चलते एक दूसरे  से मिल नहीं पाते, कभी सामने आने पर नैनों से ही आपसी अभिव्यक्ति होती है और वे एक दूसरे से एकांतमय,  क्षण मात्र के लिए ही हो पाते हैं , यह सब चल ही रहा था कि इसी बीच नायिका के विवाह के लिए घर वाले कही  रिश्ता देख आते हैं और शादी की तैयारी शुरू हो जाती है।
 जिससे वह अपने प्रेमी के लिए और तड़प जाती है तब वह नायक को एक प्रेम पत्र लिखती है जिसमें अभिव्यक्ति कम और सवाल अधिक होते हैं, और उन्हीं सवालों के मद्देनजर नायक एक प्रेम पत्र नायिका के लिए लिखता है उसके सवालों के जवाब के साथ:-
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आप कहती हैं कि हमारा आपका रिश्ता क्या है?
 तो सुनो प्रिये, हमारा आपका रिश्ता राधा- किशन के जैसा है, जिसे शादी जैसी परंपरा में नहीं बांधा जा सकता, जो सात जन्मो तक का ही नहीं वरन जन्म जन्मांतर का है जो सात्विक  प्रेम तथा आत्मिक और आध्यात्मिक सोच का स्वामी है, कुछ ऐसी चीजें हैं जिनको बनाया नहीं जा सकता वह तो परमेश्वर की मूल कृतियों के रूप में इस सर जमीन पर आते हैं और सदैव के लिए ईश्वर सत्ता का मूल आधार बन जाते हैं।
 प्रिये हम कैसे समझाएं कि हमारा आपका रिश्ता क्या है?
अब आप ही बताइए कि क्या ईश्वरी पवित्रता को समझाया जा सकता है इसे तो सिर्फ महसूस किया जा सकता है।



 हमारे आपके बीच का रिश्ता चांद- सूरज का है, नदी- पहाड़ का है, रात- दिन का है, जल -वायु का है ऐसे ना जाने कितने अनगिनत रिश्ते हैं जिनको पूर्ण रूप से विदित करना मेरे सामर्थ से बाहर है!! पर आप ही बताइए कि क्या चांद- सूरज, नदी- पहाड़, रात- दिन, जल -वायु आदि के रिश्तो को सात फेरों के बंधन में बांधा जा सकता है?
 शायद आप भी कहेंगी नहीं?
 ठीक इसी प्रकार प्रिये हमारे रिश्ते की डोर है, जिनको सामाजिक मान्यता की जरूरत नहीं यह तो दैवी अनुकंपा की प्रतिमूर्ति है जो सदियों से चला आ रहा है और अनादि तक बना रहेगा।
 अब सवाल यह आता है कि आप तो किसी और के हैं ?
पर मैं कहता हूं कि:-- नहीं, नदिया तो पहाड़ की हैं, रात तो दिन का है, जल तो वायु का है, और चांद, सूरज का ही है, लोगों ने इनको अपना मान लिया तो क्या होता है? क्या लोगों के कहने से इनके रिश्ते टूट जाएंगे नहीं प्रिये नहीं इनके आदि-अतं की कल्पना भी ना करना, यह तो चिरकाल के स्वामी हैं।
 अब रही बात मेरे याद आने की तो सुनो प्रिये, वह इसलिए आती है जिससे हमारा अस्तित्व बना रहे और प्रेम शब्द को आश्रय प्राप्त हो सके। तथा वह जीवित रह सके। नदियां पहाड़ को याद करके ही तो प्रवाह मान हैं सगिंता,जल,वायु की उत्पत्ति है रात, दिन का प्रेरक है अब तुम ही बताओ जब अपना प्यार ही इनके जैसा है तो भला कैसे ना याद आऊं आप का याद करना और मेरा याद आना कहीं से अप्रासंगिक नहीं है प्रिये यह तो प्राकृतिक सत्ता का पोषक है।
 अतः इसे आत्मसात करके जीवन की डोर मजबूत करो यही मेरा अनुनय है और यही आपका विनय है।
 आप कहती हैं कि बार-बार आपको याद करके आंखें भर आती हैं तो सुनो प्रिये यह तो आपका बड़प्पन है कि आप प्रेम की सूखती सरजमी को अपने अश्रुओं से सिंचित करती रहती हैं । जो अपने प्रेम को बल देता है।
 रही बात पल भर के लिए याद ना जाने की तो सुनो तपस्विनी यह तो आपका अगाध और अद्बिति अनुराग है जो पल भर के लिए भी आप हमें भुलाती नहीं।
 फूलों को तो महक शैने-शैने  छोड़ जाती है परंतु आप तो वह खुशबू हैं जो इस फूल को अब भी महँका रही हैं, आप तो मेरे मन मंदिर की अद्वितीय प्रतिमूर्ति हैं जो मेरी योग्यता को विस्तार दिया है इसके आगे और क्या कहूं और क्या लिखूं सारा अंश तो तेरे प्यार का है।।।

Saturday, 25 May 2019

बचपन

वैसे तो बचपन हर जीव का होता है परंतु इसे याद सिर्फ इंसान ही रख पाता है।
 यह वह उम्र होती है, जो खुशियों का खजाना लिए हुए होता है ,तभी तो जिस मिट्टी (लगने) से हम घबराते हैं उसमें भी यह खुशियां ढूंढ लेता है ,जानते हैं क्यों? क्योंकि यह वह उम्र होती है जिसमें अच्छे और बुरे का  स्थाई भान अपनो व  मित्रों के लिए नहीं होता और हो भी जाए तो बस थोड़े समय के लिए होता है, तभी तो हम खेल -खेल में नाराज होकर भी कुछ समय बाद उसी से  जाकर मिल जाते थे जिसके लिए घर के बड़ो को तू तू मैं मैं करनी पड़ी थी।
 आखिर बचपन इतना खुशियों भरा क्यों है??
 शायद इसलिए की जब हमारे गुब्बारे फूट जाते थे तब भी हम उसे उतना ही चाहते थे जितना कि उसमें हवा भरी रहने पर, बस फर्क यह था कि उससे खेलने की विधि बदल देते थे।  अतः हम कह सकते हैं कि टूटने व जुड़ने की बीच की कड़ी ही बचपन है, टूटे हुए खिलौने से खेलना ही बचपन है, हानि लाभ का हिसाब न रखना बचपन है,  हर चीज में खुशियां ढूंढ लेना बचपन है ,पूजा की पंजीरी से पेट भर लेना बचपन है, और तो और जिस उम्र में थकना मना है, वह बचपन है।
आपको तो याद होगा चोर सिपाही का वह खेल जिसमें कुछ लोग सिपाही व कुछ लोग चोर का किरदार निभाया करते थे, जिसमें सिपाही का किरदार करने वाला बालक चोर किरदार वाले बालक के प्रति कड़ाई से पेश आता था और उसके प्रति दंडात्मक कार्यवाही करता था। परंतु सवाल यह उठता है कि जो बालक बचपन में इतना न्याय प्रिय था बड़े होने पर उसमे इतना बदलाव क्यों दिखता है? यह प्रश्न हम आपके लिए छोड़ रहे हैं आप स्वयं मंथन करें।

 गर्मियों में आम की बगिया में जाना तो याद होगा जहां मित्रों के साथ खूब मस्तियां किया करते थे और गर्म हवाएं (लू )हमें छू कर आगे निकल जाया करती थी और हम थे की टस से मस नहीं होते थे, और यह पुनरावृति दिन में कई बार होती थी। और हमारी इस हठधर्मिता के कारण वह गर्म हवाएं कभी-कभी आधियों का रूप धारण कर लिया करती थी और हम उसका भी स्वागत अपनी मनो पूर्ति (आंधी आएगी तो आम गिरेंगे) के लिए करते थे और हमारी खुशी देख कर  उसे रोना आ जाता, और हम थे की उसे बरसात समझ बैठते।

 और उन्हीं बारिश के दिनों में कागज की नाव चलाना तो याद होगा, वही जिससे हम शांत जल में तैरने की अपेक्षा करते थे और हमारी अपेक्षा पर यदि खरा न उतरे तो हम उस शांत जल में लहरें पैदा करते थे, और कभी कभी लहरों का पैटर्न बिगड़ जाने पर नाव डूब जाती थी और फिर निराशा और मस्ती में आकर हम औरों की नाव चलाने और डुबाने पर लग जाते थे। और यह प्रक्रिया तब तक चलती थी जब तक की घर लौटने का समय ना हो जाए या किसी कोने से बुलावा ना आ जाए।  बचपन जिद पर आधारित होता है तभी तो हम जिस चीज के लिए जिद कर लेते थे उसे पूरा होने तक दबाव बनाए रखना अपना कर्तव्य समझते थे।अब आप कहेंगे की जिद तो बड़ों में भी पाई जाती है तो हम कहेंगे कि दोनों में मूल अंतर यह है कि बचपन का ज़िद अधिकतर अपेक्षा त्मक होता है,जबकि बड़ों का जिद अधिकतर क्रियात्मक होता है.................

भूल(द्वितीय अकं)

प्रथम अकं से अगे ---- प्रसाद घर आता है और देव को फोन लगाता है,दोनों की आपसी बातचीत होती है और उससे उस मोबाइल नंबर की जानकारी मांगता...